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रानी श्री लक्ष्मीबाई

भारत की वीरांगना रानी:
महारानी श्री लक्ष्मीबाई (1828–1858), जिनका जन्म मणिकर्णिका ताम्बे के रूप में हुआ था, भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अग्रणी और सबसे साहसी वीरांगना थीं। उन्होंने बाल्यकाल से ही तलवारबाज़ी, घुड़सवारी और युद्ध-कौशल में दक्षता प्राप्त की। झाँसी की रानी बनने के बाद, उन्होंने अंग्रेज़ों की हड़प नीति का कड़ा विरोध किया और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए वीरता से युद्ध किया।

अपने पुत्र को पीठ पर बाँधकर युद्धभूमि में उतरने वाली यह वीरांगना आज भी शौर्य, देशभक्ति और नारी शक्ति की प्रतीक हैं। मात्र 29 वर्ष की आयु में उन्होंने रणभूमि में वीरगति पाई।

"ख़ूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी!"

Rani Lakshmibai

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmibai – The Warrior Queen of Jhansi)

रानी लक्ष्मीबाई भारत के स्वाधीनता संग्राम की सबसे साहसी, प्रेरणादायक और वीरांगनाओं में से एक थीं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अद्भुत पराक्रम, वीरता और देशभक्ति का परिचय दिया। उनका जीवन भारतीय महिलाओं के साहस, आत्मबलिदान और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है।

प्रारंभिक जीवन

पूरा नाम: मणिकर्णिका ताम्बे (रानी लक्ष्मीबाई)

जन्म: 19 नवम्बर 1828, काशी (अब वाराणसी), उत्तर प्रदेश

पिता: मोरोपंत ताम्बे (पेशवा बाजीराव के दरबार में कार्यरत)

माता: भागीरथीबाई (धार्मिक और सुसंस्कारी महिला)

उपनाम: 'मनु' (बचपन में मनु कहकर पुकारा जाता था)

मनु का बचपन बहुत ही स्वतंत्र, साहसी और युद्धकला में पारंगत हुआ। उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, धनुर्विद्या और शस्त्र संचालन में दक्षता प्राप्त की।

झाँसी की रानी बनना

सन् 1842 में मनु का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव न्यूलक से हुआ और वे रानी लक्ष्मीबाई कहलाईं।

दत्तक पुत्र: दामोदर राव (गंगाधर राव की मृत्यु के बाद गोद लिया गया)

पति की मृत्यु: 1853 में महाराजा गंगाधर राव का निधन हो गया।

झाँसी हड़पने की अंग्रेजी नीति

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की डलहौजी की हड़प नीति के अंतर्गत अंग्रेजों ने झाँसी को ब्रिटिश शासन में विलीन करने की कोशिश की। उन्होंने दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया।

रानी लक्ष्मीबाई ने दृढ़ता से कहा:"मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी!"

1857 का स्वतंत्रता संग्राम

जब 1857 में देशव्यापी विद्रोह शुरू हुआ, रानी लक्ष्मीबाई भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का एक प्रमुख चेहरा बनीं। उन्होंने:

  • अपनी सेना संगठित की

  • महिला सैनिकों को प्रशिक्षित किया

  • बुंदेलखंड के अन्य राजाओं से समर्थन मांगा

  • अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में खुद भाग लिया

वीरता का प्रदर्शन

रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से कई मोर्चों पर युद्ध लड़ा। उन्होंने नाना साहब, तात्या टोपे और राव साहब जैसे क्रांतिकारियों का साथ दिया।

उनकी तलवारबाज़ी, घुड़सवारी, रणचातुर्य और नेतृत्व कौशल अद्वितीय थे। उन्होंने अपने पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधकर दुश्मनों से युद्ध किया।

ग्वालियर में अंतिम युद्ध और बलिदान

जून 1858 में अंग्रेजों ने झाँसी पर कब्ज़ा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर की ओर बढ़ीं और वहां फिर से मोर्चा संभाला।

17 जून 1858 को कोटा की सराय (ग्वालियर) में ब्रिटिश सेना के साथ युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।

उनकी वीरता देखकर जनरल ह्यूज़ ने कहा:

"यह भारतीय विद्रोह की सबसे बहादुर औरत थी!"

रानी लक्ष्मीबाई की विशेषताएँ

गुण

विवरण

देशभक्ति

जीवन का प्रत्येक क्षण देश को समर्पित

साहस

पुरुषों से भी अधिक रणक्षेत्र में पराक्रमी

रणनीति

कुशल नेतृत्व और युद्धनीति में माहिर

स्वाभिमान

अंग्रेजों के आगे कभी नहीं झुकी

नारी सशक्तिकरण की प्रतीक

महिलाओं को भी युद्ध के लिए प्रेरित किया

स्मृति और सम्मान
  • रानी लक्ष्मीबाई के सम्मान में भारत में अनेक स्मारक, सड़कें, विद्यालय, स्टैच्यू, रेलवे स्टेशन, और सरकारी संस्थान स्थापित किए गए हैं।

  • झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की गाथा बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में प्रेरणास्त्रोत है।

  • 2007 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया।

रानी लक्ष्मीबाई का जीवन यह सिखाता है कि देशभक्ति और साहस किसी लिंग, उम्र या परिस्थिति पर निर्भर नहीं होता। उनका नाम आज भी देश की वीरांगनाओं की सूची में सर्वोपरि है।


प्रसिद्ध पंक्तियाँ
"ख़ूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी!"— सुभद्राकुमारी चौहान की कविता से

झाँसी की रानी

✍🏻 सुभद्राकुमारी चौहान


सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की क़ीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी,

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद ज़बानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,

राजमहल में बजी बधाई, खुशियाँ छाई झाँसी में,

सुघट बुंदेलों की विरुदावली-सी वह आयी थी झाँसी में।

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी, रानी शोक-समानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


बुझा दीप झाँसी का, तब डलहौज़ी मन में हरषाया,

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा, झाँसी हुई बिरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


अनुनय-विनय नहीं सुनती है विकट शासकों की माया,

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,

राजाओं, नवाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महारानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,

कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,

उदयपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात?

जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,

उनके गहने, कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,

‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आह्वान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ, उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,

मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी।

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,

रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद असमानों में।

ज़ख़्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,

विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,

युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


तो भी रानी मार-काट कर चलती बनी सैन्य के पार,

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी, उसे वीरगति पानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज़ से तेज़, तेज़ की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेईस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आयी, बन स्वतंत्रता-नारी थी।

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।


जाओ रानी, याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

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