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श्री सैम मानेकशॉ

(फील्ड मार्शल सैम होर्मुसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ) भारतीय सेना के सबसे महान और सम्मानित सेनानायकों में से एक थे। वे पहले भारतीय सैन्य अधिकारी थे जिन्हें फील्ड मार्शल की सर्वोच्च सैन्य उपाधि से नवाज़ा गया। गोरखा सैनिकों द्वारा उन्हें "सैम बहादुर" के नाम से सम्मानित किया गया, जो उनके अद्वितीय साहस, नेतृत्व और सरल व्यक्तित्व का प्रतीक बना। चार दशकों की सैन्य सेवा और पाँच युद्धों में भागीदारी के साथ, उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में ऐतिहासिक विजय प्राप्त कर बांग्लादेश की स्वतंत्रता में अहम भूमिका निभाई। सैम बहादुर भारतीय सैन्य इतिहास के स्वर्णिम अध्याय हैं – एक सच्चे योद्धा, राष्ट्रभक्त और प्रेरणास्त्रोत।

Shri Sam Manekshaw

सेना के शेर: फील्ड मार्शल श्री सैम मानेकशॉ की प्रेरणादायक जीवनी

(भारत माता के सच्चे सपूत को समर्पित)

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ भारतीय सैन्य इतिहास के वो अनमोल रत्न हैं, जिनकी रणनीति, देशभक्ति और निर्भीक नेतृत्व ने भारत को 1971 के भारत-पाक युद्ध में ऐतिहासिक विजय दिलाई। वे भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल बने और आज भी उन्हें उनकी दूरदर्शिता, व्यंग्यात्मक बुद्धिमत्ता और निर्भय निर्णयों के लिए याद किया जाता है।

  • नाम: फील्ड मार्शल श्री सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ
  • जन्म: 3 अप्रैल 1914, अमृतसर, पंजाब, ब्रिटिश भारत
  • निधन: 27 जून 2008, वेलिंगटन, तमिलनाडु
  • पद: भारतीय थलसेना के पहले फील्ड मार्शल (1973)

जीवन परिचय

"वीरता, नेतृत्व और मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक"

श्री सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ, एम.सी. (3 अप्रैल 1914 – 27 जून 2008),भारत माता के उन वीर सपूतों में से एक थे, जिनका नाम सुनते ही देशभक्ति का गर्व सिर उठा लेता है। पूरे देश ने उन्हें स्नेह और सम्मान से "सैम बहादुर"कहा — एक ऐसा उपनाम जो उनकी अद्वितीय साहसिकता और फौलादी इरादों का जीवंत प्रमाण बन गया।

वे वह योद्धा थे, जिन्होंने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारतीय सेना की कमान संभालकर इतिहास की धारा बदल दी। वे भारतीय सेना के पहले अधिकारी बने जिन्हें फील्ड मार्शल जैसे सर्वोच्च सैन्य पद से सम्मानित किया गया — यह केवल रैंक नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति उनकी अगाध निष्ठा और अपार सेवा का प्रतीक था।

उनका सैन्य जीवन किसी महाकाव्य से कम नहीं था — चार दशकों तक की सैन्य सेवा, जिसकी शुरुआत उन्होंने 1932 में देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी के पहले बैच से की थी। उन्हें 12वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की चौथी बटालियन में कमीशन दिया गया, और द्वितीय विश्व युद्ध में अभूतपूर्व साहस दिखाने के लिए उन्हें मिलिट्री क्रॉस जैसे अंतरराष्ट्रीय वीरता पदक से नवाज़ा गया।

1947 में भारत के विभाजन के बाद उन्होंने 8वीं गोरखा राइफल्स में पुनः सेवा शुरू की। वे भारत-पाक युद्ध (1947) और हैदराबाद संकट के दौरान सैन्य योजनाओं के केंद्र में रहे। वे कभी किसी पैदल सेना बटालियन की कमान नहीं संभाल पाए, लेकिन उनके रणनीतिक कौशल ने उन्हें ब्रिगेडियर पद तक पहुँचा दिया — यह पद उन्होंने सैन्य अभियान निदेशालय में कार्य करते हुए प्राप्त किया।

1952 में, उन्होंने 167वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान संभाली और फिर 1954 में सैन्य प्रशिक्षण निदेशक के रूप में सेना मुख्यालय का नेतृत्व किया।उन्होंने इम्पीरियल डिफेंस कॉलेज (लंदन) से उच्च सैन्य शिक्षा प्राप्त की और 26वीं इन्फैंट्री डिवीजन के जीओसी बने। इसके बाद वे डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज के कमांडेंट बने — एक ऐसा पद जो केवल अत्यंत अनुभवी और बौद्धिक सैनिकों को सौंपा जाता है।

1962 में, उन पर एक राजनीतिक षड्यंत्र के तहत देशद्रोह का आरोप लगाया गया, जो झूठा सिद्ध हुआ, लेकिन इसके कारण वे चीन के साथ हुए युद्ध में भाग नहीं ले सके।1963 में, उन्हें सेना कमांडर के रूप में पश्चिमी कमान सौंपी गई और 1964 में पूर्वी कमान का दायित्व भी मिला।

नागालैंड और मिज़ोरम में उग्रवाद को कुशलता से काबू में लाने के लिए उन्हें 1968 में पद्म भूषण, भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान प्रदान किया गया।

1969 में, वे भारतीय सेना के सातवें सेनाध्यक्ष नियुक्त हुए और उनकी अद्वितीय रणनीति तथा नेतृत्व में भारतीय सेनाओं ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान की मजबूत सेना के खिलाफ निर्णायक विजय प्राप्त की। इसी युद्ध के बाद बांग्लादेश का स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जन्म हुआ।

राष्ट्र के लिए उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए उन्हें 1972 में भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म विभूषण प्रदान किया गया।जनवरी 1973 में, वे भारत के पहले फील्ड मार्शल बने — एक ऐसा गौरव जिसे पाने वाले वे केवल दो व्यक्तियों में से एक हैं, दूसरे थे जनरल के.एम. करियप्पा15 जनवरी 1973 को, जिसे आज हम "सेना दिवस" के रूप में मनाते हैं, उन्होंने अपनी शानदार सेवा से सेवानिवृत्ति ली।

प्रारंभिक जीवन और परिवार – एक महानायक की जड़ें

3 अप्रैल 1914 को अमृतसर की धरती पर एक बालक ने जन्म लिया, जिसने आगे चलकर भारत के सैन्य इतिहास को स्वर्णाक्षरों में लिख दिया। उस बालक का नाम था — सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ। वे एक पारसी परिवार में जन्मे थे। उनके पिता होर्मिज़द मानेकशॉ (1871–1964) पेशे से डॉक्टर थे, और माता हिला मेहता (1885–1970) एक संवेदनशील, दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला थीं। दोनों ही गुजरात के तटीय नगर वलसाड से अमृतसर आए थे।

1903 में यह परिवार मुंबई छोड़कर लाहौर की ओर रवाना हुआ था, जहां होर्मिज़द को अपनी चिकित्सा सेवा आरंभ करनी थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। जब उनकी ट्रेन अमृतसर स्टेशन पर रुकी, तब गर्भवती हिला की तबीयत इतनी बिगड़ गई कि वे आगे की यात्रा नहीं कर सकीं। इसी भूमि पर, एक गहरे साँस में, उन्होंने अपने बेटे को जन्म दिया — यही बालक आगे चलकर बना “सैम बहादुर”

हिला के स्वास्थ्य के सुधरने के बाद, दंपति ने अमृतसर को ही अपना स्थायी निवास बना लिया। वहीं होर्मिज़द ने अपना क्लिनिक और फार्मेसी शुरू की। यह परिवार छह संतानों से समृद्ध हुआ — चार बेटे: फली, जान, सैम और जामी, और दो बेटियाँ: सिला और शेरू। सैम इनका तीसरा पुत्र और पांचवां संतान थे।

परिवार में देशसेवा और शिक्षा का गहरा संस्कार था। उनके पिता प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना में इंडियन मेडिकल सर्विस के कप्तान के रूप में सेवा कर चुके थे।बड़े भाई फली और जान ने इंजीनियरिंग की राह चुनी, बहनें सिला और शेरू शिक्षिका बनीं।सबसे छोटे भाई जामी मानेकशॉ, डॉक्टर बने और उन्होंने रॉयल इंडियन एयर फोर्स में मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवा दी। 1948 में जामी ने अमेरिका के नेवल एयर स्टेशन पेंसाकोला से प्रशिक्षण लेकर एयर सर्जन के पंख प्राप्त करने वाले पहले भारतीय बने।उन्होंने भी अपने बड़े भाई सैम की तरह सैन्य सेवा में ऊँचाई पाई और भारतीय वायुसेना में एयर वाइस मार्शल के पद से सेवानिवृत्त हुए।

यह परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं था, यह था सेवा, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का वंश।जहाँ एक ओर पिता ने औषधि से जीवन बचाया, वहीं सैम मानेकशॉ ने रणभूमि में देश की आत्मा को सुरक्षित रखा।

यह वही पृष्ठभूमि थी जिसने एक बालक को महान सेनानायक और भारत के सबसे प्रतिष्ठित सैन्य नेता में ढाल दिया।

शिक्षा – जहां शुरू हुई एक फौलादी नेतृत्व की नींव

सैम मानेकशॉ की शिक्षा की शुरुआत पंजाब में हुई, जहाँ उन्होंने प्राथमिक स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद उनका दाखिला नैनीताल के प्रतिष्ठित शेरवुड कॉलेज में हुआ, जहाँ उन्होंने पूरे आठ वर्षों तक अध्ययन किया। वे शुरू से ही तेज़, अनुशासित और जिज्ञासु छात्र रहे।1931 में, उन्होंने सीनियर हाई स्कूल परीक्षा शानदार अंकों के साथ उत्तीर्ण की, जिससे उनके भीतर डॉक्टर बनने का सपना और प्रबल हो उठा।

उन्होंने अपने पिता से आग्रह किया कि उन्हें लंदन भेजा जाए ताकि वे चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई कर सकें। लेकिन उनके पिता ने यह कहकर मना कर दिया कि उनकी उम्र अभी छोटी है, और वे पहले से ही उनके बड़े भाइयों की लंदन में इंजीनियरिंग की पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं। यह इनकार सैम के भीतर एक विद्रोह की चिंगारी बनकर जल उठा — एक चुप स्वप्न, एक अघोषित चुनौती

अपनी परिस्थितियों से समझौता करते हुए, सैम ने हिंदू सभा कॉलेज (वर्तमान में हिंदू कॉलेज, अमृतसर) में दाखिला लिया और अप्रैल 1932 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। परंतु नियति उन्हें कहीं और ले जाने को तैयार थी।

उसी वर्ष, भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून की स्थापना की गई, और 1932 की शुरुआत में प्रवेश परीक्षा के लिए अधिसूचना जारी हुई। परीक्षा जून या जुलाई में प्रस्तावित थी। यह मौका सैम के भीतर छिपे उस विद्रोही स्वभाव के लिए एक आदर्श अवसर बन गया।

पिता की आज्ञा के विरुद्ध, सैम ने चुपचाप दिल्ली जाकर प्रवेश परीक्षा दी — यह एक युवा का आत्मनिर्भरता की ओर पहला साहसी कदम था।1 अक्टूबर 1932 को, सैम मानेकशॉ का नाम उन 15 कैडेट्स में शामिल हुआ, जिन्हें देशभर से खुले प्रतियोगिता के माध्यम से चुना गया था। और आश्चर्य की बात यह थी कि वे मेरिट सूची में छठे स्थान पर थे।

इस चयन ने केवल उनके जीवन की दिशा नहीं बदली, बल्कि भारत को एक ऐसा सपूत दिया जो आगे चलकर रणभूमि में पराक्रम और रणनीति का दूसरा नाम बना।

यह वह क्षण था, जहाँ एक बेटे के सपने और राष्ट्र की आवश्यकता एक दूसरे से टकराए, और उस टकराहट से जन्म लिया "सैम बहादुर" ने।

भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) — जहाँ एक योद्धा गढ़ा गया

जब देश को अपने भविष्य के रक्षकों की पहली खेप तैयार करनी थी, तब भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून (IMA) की स्थापना हुई — और उसी प्रथम बैच में शामिल हुए एक तेजस्वी, दृढ़निश्चयी युवा कैडेट — सैम मानेकशॉ।इस प्रथम बैच को गौरवपूर्ण नाम दिया गया — "द पायनियर्स" यानी "अग्रदूत"। इसी दल में बर्मा और पाकिस्तान के भविष्य के सेना प्रमुख — स्मिथ डन और मुहम्मद मूसा खान भी शामिल थे। यह संयोग नहीं था, यह इतिहास के पन्नों पर दर्ज होने वाली नियति थी।

हालाँकि आधिकारिक रूप से अकादमी का उद्घाटन 10 दिसंबर 1932 को हुआ, लेकिन प्रशिक्षण की शुरुआत इससे पहले ही 1 अक्टूबर 1932 को हो गई थी।सैम मानेकशॉ के प्रशिक्षण के दिनों में ब्रिगेडियर लायनेल पीटर कॉलिन्स अकादमी के कमांडेंट थे — एक सख्त अनुशासनप्रिय अधिकारी।

अपने प्रशिक्षण काल में मानेकशॉ ने न केवल शारीरिक और मानसिक दृढ़ता दिखाई, बल्कि वे उस बैच में फील्ड मार्शल तक पहुंचने वाले अकेले कैडेट बने — एक ऐसी ऊँचाई जिसे न तो समय मिटा सकता है और न ही इतिहास भूल सकता है।

उन दिनों की एक शरारतपूर्ण घटना भी उल्लेखनीय है — एक बार वे अपने मित्रों कुमार जीत सिंह (कपूरथला के महाराजकुमार) और हाजी इफ्तिखार अहमद के साथ मसूरी छुट्टियां मनाने चले गए और सुबह की ड्रिल में समय पर नहीं लौटे। इसके चलते उनके ऊपर अकादमी से निलंबन का खतरामंडराने लगा। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था — वह नायक को परीक्षा तो देती है, पर गिरने नहीं देती।

40 कैडेट्स में से केवल 22 ने कठिन सैन्य प्रशिक्षण पूरा किया, और अंततः वे सभी 1 फरवरी 1935 को सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त कर सेना में शामिल हुए।

इस बैच में शामिल कुछ नाम समय के साथ किंवदंती बन गए —दीवान रणजीत राय,मोहान सिंह (भारतीय राष्ट्रीय सेना के संस्थापक),मेलविल डी मेलो (प्रसिद्ध रेडियो उद्घोषक),और पाकिस्तानी सेना के दो जनरल – मिर्ज़ा हमीद हुसैन और हबीबुल्ला ख़ान खट्टक।इनमें से कई बाद में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना द्वारा बंदी बना लिए गए, और उनमें से कुछ ने आजाद हिंद फौज में भी हिस्सा लिया — उन सेनानियों की फौज, जो अंग्रेज़ों से भारत की आज़ादी के लिए लड़ी।

मानेकशॉ के जूनियर और मुक्केबाज़ी के साथी थे — टीक्का ख़ान, जो बाद में पाकिस्तान की सेना में शामिल हुए। इस तरह मानेकशॉ का प्रशिक्षण काल, केवल एक सैनिक की शिक्षा नहीं, बल्कि आने वाले युगों के राजनीतिक और सैन्य भूगोल की नींव थी।

भारतीय सैन्य अकादमी के उस परिसर में, केवल सैनिक नहीं बनते — वहाँ से उठता है एक नेतृत्व, एक दृष्टि, एक राष्ट्रप्रेम का तूफ़ान।और उन सभी में सबसे ऊँचा उठने वाला सितारा था — सैम बहादुर

सैन्य जीवन की शुरुआत – साहस की पहली सीढ़ियाँ

जब सैम मानेकशॉ को भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त हुआ, तब वह समय था जब नव-नियुक्त भारतीय अधिकारियों को पहले ब्रिटिश रेजिमेंट में सेवा का अनुभव लेना पड़ता था — यह एक परंपरा थी, परंतु सैम के लिए यह नेतृत्व की पहली परीक्षा थी।

उनकी पहली पोस्टिंग हुई लाहौर में तैनात रॉयल स्कॉट्स की दूसरी बटालियन में। यहाँ उन्होंने सैन्य अनुशासन, ब्रिटिश सैन्य प्रणाली, और रणनीति के अत्यंत कठोर और व्यावहारिक पाठ सीखे। लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी।

इसके बाद उनका स्थानांतरण हुआ 12वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की चौथी बटालियन (4/12 एफएफ) में, जो उस समय बर्मा की सीमाओं पर तैनातथी — जहाँ वातावरण कठोर था, चुनौतियाँ विकराल थीं, और हर साँस में युद्ध की आहट थी।

1 मई 1938 को, सैम को उनकी कंपनी का क्वार्टरमास्टर (Quartermaster) नियुक्त किया गया — एक ऐसा उत्तरदायित्व जिसमें सैनिकों के रसद, आपूर्ति और प्रबंध की पूरी ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।

परंतु केवल हथियार चलाना ही उनकी शक्ति नहीं थी — सैम मानेकशॉ की सबसे बड़ी ताक़त थी उनकी भाषा और संवाद की कला।वे पहले से ही पंजाबी, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी और अपनी मातृभाषा गुजराती में पारंगत थे। लेकिन वे यहीं नहीं रुके —अक्टूबर 1938 में, उन्होंने पश्तो भाषा में "हायर स्टैंडर्ड आर्मी इंटरप्रेटर" की परीक्षा पास कर, एक नई ऊंचाई हासिल की। यह केवल भाषा ज्ञान नहीं था — यह था सीमा पार के मनोविज्ञान को समझने का हथियार

उनकी सैन्य यात्रा की यह आरंभिक सीढ़ियाँ, आज़ाद भारत के भविष्य सेनानायक की नींव बन रही थीं।सामान्य अफसरों से अलग, सैम मानेकशॉ हर कदम पर यह साबित कर रहे थे कि वे केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि रणनीति, नेतृत्व और दृष्टिकोण के प्रतीक हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध – शौर्य, बलिदान और अमरता की गाथा

द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के साथ ही सेना में योग्य अधिकारियों की भारी कमी थी। ऐसे समय में, अनुभव से ज़्यादा आवश्यकता को प्राथमिकता दी गई — और इसीलिए सैम मानेकशॉ को दो वर्षों तक कैप्टन और फिर मेजर के रूप में अस्थायी रूप से नियुक्त किया गया।अंततः, 4 फरवरी 1942 को वे स्थायी रूप से कैप्टन के पद पर पदोन्नत हुए।

पैगोडा हिल की लड़ाई – जहाँ एक सैनिक अमर हुआ

1942 का वर्ष, और रणभूमि थी बर्मा का सिटांग नदी क्षेत्र। वहाँ पर तैनात थी 4/12 फ्रंटियर फोर्स, और उसके नेतृत्व में थे कप्तान सैम मानेकशॉपैगोडा हिल नामक एक महत्वपूर्ण रणनीतिक ऊँचाई को जापानी सेना ने कब्ज़े में ले लिया था। उसी क्षण, मानेकशॉ ने अपनी कंपनी के साथ पलटवार किया।

यह कोई सामान्य युद्ध नहीं था — यह था मृत्यु को चुनौती देने का साहस, और भारत मां के सम्मान की रक्षा का संकल्प।हालाँकि कंपनी को 30% से अधिक हानि उठानी पड़ी, फिर भी मानेकशॉ ने अपने बेजोड़ नेतृत्व और अडिग साहस के बल पर लक्ष्य प्राप्त कर लिया। उन्हें कैप्टन जॉन नील रैंडल की कंपनी से भी सहायता प्राप्त हुई।

शिखर जीतने के तुरंत बाद, मानेकशॉ दुश्मन की मशीनगन की गोलियों से बुरी तरह घायल हो गए — गोलियाँ उनके पेट में लगीं, और जीवन एक धुंधली रेखा पर आ टिका।

17वीं इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल डेविड कोवान, जो दूर से युद्ध देख रहे थे, इस वीरता से अभिभूत हो उठे और वहीं मानेकशॉ को "मिलिट्री क्रॉस" से सम्मानित किया — एक वीर योद्धा के जीवन की अमिट पहचान।

इस सम्मान की आधिकारिक घोषणा लंदन गजट के विशेष परिशिष्ट में प्रकाशित हुई। उस प्रशस्ति में लिखा गया:

"यह अधिकारी अपनी बटालियन की ‘ए’ कंपनी की कमान संभाल रहे थे, जब उन्हें पैगोडा हिल पर पलटवार का आदेश मिला। भयंकर हानि के बावजूद, इस अधिकारी के उत्कृष्ट नेतृत्व के कारण यह मिशन सफल रहा।"
मौत के द्वार से वापसी — एक चमत्कारी जीवन

घायल मानेकशॉ को उनके आदेशक सिपाही शेर सिंह ने युद्धभूमि से बाहर निकाला और एक ऑस्ट्रेलियाई सर्जन के पास ले गए।सर्जन ने पहले इलाज से इनकार कर दिया — बोला, “यह बच नहीं पाएगा।”लेकिन शेर सिंह ने हार नहीं मानी, और डॉक्टर को इलाज के लिए मना ही लिया।

जब सैम होश में आए और डॉक्टर ने उनसे पूछा कि उन्हें क्या हुआ है, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा,“A mule kicked me” (मुझे खच्चर ने लात मारी है)।डॉक्टर उनके हास्यबोध और जीवट से प्रभावित हुए और तुरंत ऑपरेशन कर गोलियाँ उनके फेफड़ों, लिवर और किडनी से निकालीं।आंतों का बड़ा हिस्सा निकालना पड़ा, लेकिन चमत्कार हुआ — सैम मानेकशॉ जीवित रहे।

अजेय वापसी – कर्मभूमि पर पुनः पदार्पण

युद्ध के बाद, मानेकशॉ ने 23 अगस्त से 22 दिसंबर 1943 तक क्वेटा स्थित कमांड एंड स्टाफ कॉलेज में आठवाँ स्टाफ कोर्स पूरा किया। इसके बाद उन्हें रज़मक ब्रिगेड का ब्रिगेड मेजर बनाया गया, जहाँ वे 22 अक्टूबर 1944 तक सेवारत रहे।

फिर वे 9वीं बटालियन, 12वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट में सम्मिलित हुए, जो कि जनरल विलियम स्लिम की अधीनता में 14वीं सेना का हिस्सा थी।30 अक्टूबर 1944 को, उन्हें अस्थायी लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में पदोन्नत किया गया।

युद्ध के अंत में, वे 20वीं भारतीय इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल डगलस ग्रेसी के स्टाफ ऑफिसर बने।

जापानी आत्मसमर्पण – आत्मबल से अनुशासन की मिसाल

जब जापान ने आत्मसमर्पण किया, तब मानेकशॉ को 10,000 से अधिक जापानी युद्धबंदियों के निरस्त्रीकरण की जिम्मेदारी सौंपी गई।इस शिविर में न तो कोई अनुशासनहीनता हुई, न कोई भागने की कोशिश — यह उनकी नेतृत्व क्षमता और अनुशासन का प्रमाण था।

5 मई 1946 को उन्हें एक्टिंग लेफ्टिनेंट कर्नल बनाया गया और फिर उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में छह महीने का व्याख्यान दौरा पूरा किया।

1945 से 1946 तक, वे और याह्या खान (जो बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने) फील्ड मार्शल सर क्लॉड ऑचिनलेक के स्टाफ अधिकारी थे।4 फरवरी 1947 को, उन्हें स्थायी रूप से मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया और भारत लौटने पर उन्हें सैन्य अभियानों निदेशालय (MO Directorate) में ग्रेड 1 जनरल स्टाफ ऑफिसर (GSO1) के रूप में नियुक्त किया गया।

यह केवल एक युद्ध की कहानी नहीं थी — यह एक योद्धा की आत्मा का प्रमाण था, जिसने मृत्यु को हराकर इतिहास लिखा और भारत को अपना सच्चा रक्षक दिया।

स्वतंत्र भारत का सपूत – सेवा, समर्पण और राष्ट्रभक्ति की नई शुरुआत

1947 में भारत का विभाजन, केवल भूगोल का बंटवारा नहीं था — यह उन सपूतों की अग्निपरीक्षा थी, जिन्होंने न केवल देश के लिए शपथ ली थी, बल्कि अपने प्राणों की आहुति भी देने को तैयार थे।सैम मानेकशॉ की रेजिमेंट — 12वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की चौथी बटालियन — पाकिस्तान सेना का हिस्सा बन गई। लेकिन मानेकशॉ का हृदय भारत के लिए धड़कता था।

ऐसे कठिन समय में, पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल और संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने स्वयं मानेकशॉ को पाकिस्तानी सेना में शामिल होने का प्रस्ताव दिया, परंतु सैम बहादुर ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।उनका उत्तर सरल था लेकिन ऐतिहासिक:"मैं उस भूमि की सेवा करूँगा, जिसकी मिट्टी में मेरा विश्वास है – वह भारत है।"

कश्मीर संकट – एक सच्चे सिपाही की निर्णायक भूमिका

22 अक्टूबर 1947 को, पाकिस्तान समर्थित कबायली बलों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया और डोमेल व मुज़फ़्फराबाद पर कब्ज़ा कर लिया।उसी समय मानेकशॉ को 5 गोरखा राइफल्स की तीसरी बटालियन की कमान सौंपी गई थी, लेकिन इतिहास को कुछ और मंज़ूर था।

25 अक्टूबर को, मानेकशॉ ने वी. पी. मेनन के साथ श्रीनगर का हवाई सर्वेक्षण किया। स्थिति भयावह थी। उन्होंने तुरंत दिल्ली लौटकर लॉर्ड माउंटबेटन और प्रधानमंत्री नेहरू को युद्ध की भयावहता से अवगत कराया।

27 अक्टूबर की सुबह, भारतीय सेना की पहली टुकड़ी श्रीनगर भेजी गई — मानेकशॉ की रणनीति और तत्परता के कारण आज कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।उनकी नियुक्ति 3/5 G.R. में रद्द कर दी गई और उन्हें सैन्य अभियान निदेशालय (MO Directorate) में तैनात किया गया।

रणनीति के शिल्पकार – युद्ध भूमि से योजना कक्ष तक

हैदराबाद के विलय और कश्मीर के संघर्ष के बीच, मानेकशॉ ने सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रत्यक्ष ब्रीफिंग दी।यही वजह रही कि वह कभी किसी बटालियन की औपचारिक कमान नहीं संभाल पाए — परंतु उनके योगदान एक बटालियन नहीं, पूरी सेना के मार्गदर्शक बन गए।

MO निदेशालय में सेवा के दौरान उन्हें पहले कर्नल, फिर ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत किया गया। वे भारतीय सेना के डायरेक्टर ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स (DMO) बनाए गए — एक ऐसा पद, जहाँ हर निर्णय युद्ध की दिशा बदल सकता था।

कराची समझौता – जब सीमाएं बनीं, पर विश्वास बना रहा

1949 के कराची सम्मेलन में मानेकशॉ ने भारत का प्रतिनिधित्व किया, जहाँ कराची समझौते और सीज़फायर लाइन (जो बाद में लाइन ऑफ कंट्रोल बनी) पर निर्णय लिया गया।

इस ऐतिहासिक बैठक में उनके साथ शामिल थे —ले. जनरल एस. एम. श्रीनागेश,मेजर जनरल के. एस. थिमैया,एवं नागरिक प्रतिनिधि विष्णु सहाय और एच.एम. पटेल।मानेकशॉ इस रणनीतिक वार्ता में भारत की सामरिक गरिमा की आवाज़ बनकर उभरे।

आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण की नींव

4 फरवरी 1952 को वे स्थायी रूप से कर्नल के पद पर पदोन्नत हुए और अप्रैल में 167 इन्फैंट्री ब्रिगेड, फिरोजपुर के कमांडर नियुक्त किए गए।9 अप्रैल 1954 को, उन्होंने सेना मुख्यालय में सैन्य प्रशिक्षण निदेशक का पदभार संभाला।

14 जनवरी 1955 को, उन्हें मऊ स्थित इन्फैंट्री स्कूल के कमांडेंट की जिम्मेदारी मिली। साथ ही, वे 8वीं गोरखा राइफल्स और 61वीं कैवेलरी के औपचारिक कर्नल भी बनाए गए।

मानेकशॉ ने पाया कि भारतीय सेना के प्रशिक्षण मैनुअल पुराने पड़ चुके थे।उन्होंने इन्हें आधुनिक युद्ध नीति के अनुसार पुनः तैयार करवाया — यह एक दूरदर्शी सुधार था, जिसने आने वाली पीढ़ियों को एक नई युद्धनीति दी।

4 फरवरी 1957 को, उन्हें स्थायी रूप से ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत किया गया।उनका जीवन अब युद्धभूमि से आगे बढ़कर रणनीति, नीति और नेतृत्व के वैश्विक मंच पर पहुँच चुका था।

🌟 एक सच्चा सिपाही कभी सेवानिवृत्त नहीं होता – वह इतिहास बनाता है।

सैम मानेकशॉ अब केवल एक सेनाधिकारी नहीं रहे — वह बन चुके थे स्वतंत्र भारत की सैन्य आत्मा का प्रतीक, जिनकी सोच, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बन गई।

जनरल अधिकारी के रूप में – नेतृत्व की परीक्षा, निष्ठा की विजय

1957, एक ऐसा वर्ष जब सैम मानेकशॉ ने भारतीय सेना में एक और सुनहरा अध्याय शुरू किया। उन्हें लंदन के इम्पीरियल डिफेंस कॉलेज भेजा गया, जहाँ उन्होंने एक वर्ष का उच्च कमान पाठ्यक्रम पूरा किया।वहां से लौटने के बाद, उन्हें 26वीं इन्फैंट्री डिवीजन का जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) नियुक्त किया गया।यह वो दौर था जब जनरल के. एस. थिमैया सेनाध्यक्ष थे और कृष्ण मेनन रक्षा मंत्री।

एक बार जब रक्षा मंत्री मेनन उनके डिवीजन के दौरे पर आए, तो उन्होंने मानेकशॉ से थिमैया के बारे में राय पूछी।मानेकशॉ ने निडरता से कहा,"किसी वरिष्ठ अधिकारी का मूल्यांकन करना अनुचित है, और कृपया भविष्य में किसी से ऐसा प्रश्न न करें।"

यह सुनकर मेनन नाराज़ हो गए और बोले –"मैं चाहूँ तो थिमैया को हटा सकता हूँ।"मानेकशॉ ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया –"आप उन्हें हटा सकते हैं, लेकिन मैं एक और थिमैया ले आऊँगा।"

संस्थानों के निर्माता – जहां से भविष्य के सेनानायक निकले

1 मार्च 1959 को उन्हें स्थायी रूप से मेजर जनरल बना दिया गया।1 अक्टूबर को, उन्हें वेलिंग्टन स्थित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज का कमान्डेंट बनाया गया — एक ऐसा संस्थान जो भावी सैन्य नेताओं को तैयार करता है।

लेकिन यहीं एक राजनीतिक साजिश ने मानेकशॉ के करियर को लगभग समाप्त कर दिया।

राजनीतिक टकराव – जब सच्चाई कटघरे में थी

1961 में, सेनाध्यक्ष थिमैया ने इस्तीफा दे दिया।रक्षा मंत्री मेनन ने उनकी सिफारिश को नजरअंदाज करते हुए ब्रिगेडियर बी. एम. कौल को लैफ्टिनेंट जनरल बना कर क्वार्टर मास्टर जनरल नियुक्त कर दिया।

कौल, नेहरू और मेनन के अत्यंत करीबी हो गए और सेना के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप करने लगे — जो मानेकशॉ और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को नागवार गुज़रा।

इसी राजनीतिक द्वंद्व में, मानेकशॉ पर देशद्रोह (राजद्रोह) का आरोप लगा दिया गया।उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने कार्यालय से ब्रिटिश रानी और अफसरों की तस्वीरें नहीं हटाई थीं, जिससे साबित होता था कि वह भारत की बजाय ब्रिटेन के प्रति वफादार हैं!

पश्चिमी कमान के कमांडर-इन-चीफ ले. जनरल दौलत सिंह की अध्यक्षता में कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी हुई, जिसने पाया कि इन आरोपों का कोई आधार नहीं है।लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी — चीन-भारत युद्ध (1962) शुरू हो गया था और मानेकशॉ उसमें शामिल नहीं हो पाए।

नेहरू का पश्चाताप और सैम की वापसी

युद्ध में भारत की पराजय के बाद कौल और मेनन को हटाया गयानवंबर 1962 में, खुद प्रधानमंत्री नेहरू ने मानेकशॉ से संपर्क कर उन्हें IV कोर का कमांडर बनने को कहा।

मानेकशॉ ने विनम्र पर स्पष्ट शब्दों में कहा –"जो मेरे साथ हुआ, वह एक षड्यंत्र था। मेरी पदोन्नति भी 18 महीने से लंबित है।"यह सुनकर नेहरू ने उनसे माफी मांगी

2 दिसंबर 1962 को, उन्हें अस्थायी लैफ्टिनेंट जनरल बनाकर तेज़पुर स्थित IV कोर का जीओसी नियुक्त किया गया।

हिम्मत टूटे नहीं – सैनिकों के हौसले की पुनर्स्थापना

पद संभालते ही मानेकशॉ ने देखा कि पराजय का सबसे बड़ा कारण कमज़ोर नेतृत्व और सैनिकों में टूटता आत्मबल था।

उन्होंने आदेश दिया:"अब से कोई भी पीछे नहीं हटेगा, जब तक मेरी लिखित अनुमति न हो।"

उन्होंने NEFA (नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) में तैनात सैनिकों के लिए बेहतर उपकरण, आवास और कपड़े सुनिश्चित किए।

विश्लेषक श्रीनाथ राघवन के अनुसार, मानेकशॉ और सेनाध्यक्ष जे. एन. चौधरी ने चीन को उकसाने से बचने के लिए वर्ष 1963 के अंत तक सतर्कता बरती।

सेना में नई ऊर्जा, नया विश्वास

20 जुलाई 1963 को, उन्हें स्थायी रूप से लैफ्टिनेंट जनरल बना दिया गया और5 दिसंबर को, वे पश्चिमी कमान (Western Command) के जीओसी-इन-सी नियुक्त हुए।

लेकिन मई 1964 में जब पंडित नेहरू का निधन हुआ, तो सेना की टुकड़ियों को दिल्ली में तैनात करने पर अफवाहें फैलीं कि सैन्य तख्तापलट की योजना है।हालाँकि सेना ने स्पष्ट किया कि यह भीड़ नियंत्रण के लिए किया गया था।

इस संवेदनशील माहौल में, 16 नवंबर 1964 को, मानेकशॉ को कोलकाता स्थानांतरित कर पूर्वी कमान का जीओसी-इन-सी बना दिया गया।

पूर्वोत्तर की ज्वालाओं में शांति की लौ

मानेकशॉ ने नागालैंड और मिजोरम में उग्रवाद से निपटने में दृढ़ रणनीति और मानवीय दृष्टिकोण का अद्भुत संतुलन दिखाया।1968 में, इस योगदान के लिए उन्हें भारत के तृतीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान – पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

यह सिर्फ सैन्य नेतृत्व नहीं था — यह था चरित्र, निष्ठा और भारत के प्रति प्रेम का परचम, जो हर निर्णय में लहराता रहा।

नाथू ला और चो ला संघर्ष – जब हिमालय की चोटियों पर भारत की दृढ़ता गूँजी

साल 1967, चीन-भारत युद्ध को पाँच वर्ष बीत चुके थे, परंतु ड्रैगन की मंशा अब भी शांति की ओर नहीं थी।सिक्किम की बर्फीली चोटियों पर स्थित चार अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य चौकियों – नाथू ला, जेलेप ला, सेबू ला और चो ला – पर चीन ने कब्ज़ा करने की योजना बनाई।

ये चौकियाँ केवल बर्फ से ढकी ऊँचाइयाँ नहीं थीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर प्रवेश द्वार – 'चिकन नेक' को सुरक्षा देने वाली अंतिम रक्षा पंक्तियाँ थीं।

चीन के अचानक हमले ने तनाव को चरम पर पहुँचा दिया।परंतु इस बार भारत ने पीछे हटने का नाम नहीं लिया।

मेजर जनरल सगत सिंह ने निर्णय लिया –"इस बार हम डटकर मुकाबला करेंगे।"और उनके इस साहसी संकल्प को जनरल सैम मानेकशॉ का पूर्ण समर्थन मिला।

मानेकशॉ ने मुस्कराते हुए कहा –

"मुझे डर है कि ये लोग ‘हैमलेट’ का नाटक बिना प्रिंस के कर रहे हैं।अब मैं बताता हूँ कि इसे कैसे समाप्त करना है।"

यह कथन मात्र एक व्यंग्य नहीं था – यह था एक रणनीतिक शंखनाद, जिसने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब न झुकेगा, न रुकेगा।

भारतीय सेना ने अद्भुत संयम, साहस और रणनीति का परिचय देते हुए दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

🇮🇳 और परिणाम... एक ऐतिहासिक विजय!

चीन को नाथू ला और चो ला क्षेत्रों से पीछे हटना पड़ा, और भारत ने एक बार फिर सिद्ध किया कि हिमालय की ऊँचाइयाँ उसकी अस्मिता की रक्षा में अडिग प्रहरी हैं।

यह संघर्ष केवल सीमाओं का नहीं था, यह आत्मसम्मान, नेतृत्व और सैन्य शौर्य की अमर गाथा थी,जहाँ मानेकशॉ की दूरदर्शिता और सगत सिंह की दृढ़ता ने मिलकर भारत को एक स्वाभिमानी जीत दिलाई।

सेनाध्यक्ष के रूप में सैम बहादुर – न्याय, निडरता और नेतृत्व की मिसाल

साल 1969, जून का महीना...जैसे ही जनरल पी. पी. कुमारमंगलम ने सेना प्रमुख के पद से विदा ली, उसी दिन – 8 जून 1969 को — भारत को मिला उसका आठवां सेनाध्यक्ष:जनरल सैम होर्मुसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ

भारतीय सेना को न केवल एक रणनीतिक नेतृत्वकर्ता मिला, बल्कि एक ऐसा सेनानायक जिसने सिद्धांतों को पद से ऊपर रखा

समानता के प्रहरी – आरक्षण नहीं, अवसर समान चाहिए

उस समय सरकार में यह चर्चा थी कि सेना में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए आरक्षण लागू किया जाए।हालाँकि वे स्वयं एक अल्पसंख्यक पारसी समुदाय से आते थे, मानेकशॉ ने दृढ़ता से इसका विरोध किया।

उन्होंने कहा —

"सेना की आत्मा समानता, समर्पण और योग्यता में निहित है।यहाँ हर एक को अवसर मिलना चाहिए — जाति, धर्म, वर्ग के आधार पर विभाजन नहीं।"

उनकी यह सोच, सेना के नैतिक ढांचे की रक्षा करने वाली थी — एक ऐसा निर्णय जो आज भी भारतीय सेना की गौरवशाली निष्पक्षता का आधार है।

'सैम बहादुर' – एक नाम जो दिलों में बसा

जुलाई 1969 में उन्होंने 8 गोरखा राइफल्स की एक बटालियन का दौरा किया।उन्होंने एक सिपाही से पूछा –"क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे सेनाध्यक्ष का नाम क्या है?"

सिपाही ने जवाब दिया –"हाँ साहब, सैम बहादुर!"(अर्थात् – "सैम, जो बहादुर है")

और उसी क्षण से पूरा देश उन्हें "सैम बहादुर" के नाम से जानने लगा –एक नाम, जो केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन गया।

साजिशों के बीच सच्चाई की आवाज़

उनके नेतृत्व की स्पष्टता और लोकप्रियता इतनी प्रबल थी कि कुछ हलकों में आशंका फैल गई कि"कहीं मानेकशॉ तख्तापलट न कर दें?"

यह प्रश्न खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी पूछा।

सैम मानेकशॉ ने मुस्कराकर उत्तर दिया —

"मैं लोकतंत्र में विश्वास करता हूँ। मेरी वफादारी देश और संविधान से है।"

एक बार, जब एक अमेरिकी राजनयिक ने (यूएस एम्बेसडर केनेथ कीटिंग की उपस्थिति में) उनसे मज़ाक में पूछ लिया —"जनरल, आप कब तख्तापलट करेंगे?"

मानेकशॉ ने हँसते हुए जवाब दिया —

"ठीक उसी दिन, जिस दिन जनरल वेस्टमोरलैंड तुम्हारे अमेरिका का नियंत्रण ले लेंगे!"

उनकी यह चुटीली लेकिन स्वाभिमानी प्रतिक्रिया, राजनीतिक सूझबूझ और लोकतांत्रिक मूल्यों की गहराई को दर्शाती है।

**सच बोलने का साहस, सेना को दिशा देने की दृढ़ता,

और हर सैनिक के दिल में बसने वाला अपनापन — यही थे 'सैम बहादुर'।**

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 1971 – सैम बहादुर की रणनीति, भारत की विजय

16 दिसंबर 1971 — एक ऐसा दिन जब ढाका के ऐतिहासिक मैदान पर पाकिस्तानी जनरल ए.ए.के. नियाज़ी ने भारतीय जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए।यह केवल काग़ज़ पर स्याही नहीं थी,बल्कि थी एक नवजात राष्ट्र 'बांग्लादेश' की उद्घोषणा,और उसके पीछे था —फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का अद्वितीय नेतृत्व, दूरदर्शिता और धैर्य।

संघर्ष की चिंगारी और भारत का मानवीय हस्तक्षेप

1970 में पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश), जो जनसंख्या में बहुल था,अपने अधिकारों और स्वायत्तता की मांग कर रहा था।पश्चिमी पाकिस्तान की सत्ता ने इस आवाज़ को बर्बरता से कुचलने की ठानी।मार्च 1971 में पाकिस्तानी सेना ने निर्दोष बंगालियों पर कहर बरपाया —लाखों की हत्या, और करीब 1 करोड़ शरणार्थी भारत की ओर भागे।भारत की सीमाओं पर दुख, क्रंदन और विनाश का मंजर था।

युद्ध नहीं, विजय चाहिए — मानेकशॉ की रणनीति

अप्रैल के अंतिम सप्ताह में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मानेकशॉ से पूछा —"क्या आप युद्ध के लिए तैयार हैं?"

सैम ने शांत भाव से कहा —

“मेरे पास पर्याप्त टैंक नहीं हैं, फसल कटाई के लिए रेलें पहले से व्यस्त हैं,और जल्द ही हिमालयी दर्रे खुलने से बाढ़ का खतरा है।यदि आप मुझे मेरी शर्तों पर युद्ध की योजना बनाने दें —तो मैं आपको **विजय की गारंटी देता हूँ।”

गांधी जी ने उन पर पूर्ण विश्वास जताया।

छाया से पहले बिजली — पूर्व-युद्ध की तैयारी

मानेकशॉ के नेतृत्व में भारतीय सेना ने 'मुक्ति बाहिनी' को प्रशिक्षित किया —करीब 75,000 बंगाली लड़ाके तैयार किए गए।उन्होंने पाकिस्तानी सेना को अंदर से कमजोर करना शुरू किया।

3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारतीय हवाई अड्डों पर बमबारी कर युद्ध छेड़ दिया —परंतु यह कदम बना उनकी विनाश यात्रा की शुरुआत

त्रिशूल जैसी रणनीति, तीन दिशाओं से वार

मानेकशॉ ने पूर्वी मोर्चे पर तीन दिशाओं से प्रवेश की योजना बनाई:

  • पश्चिम से: II कोर – लेफ्टिनेंट जनरल टी.एन. रैना

  • पूर्व से: IV कोर – लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह

  • उत्तर से: XXXIII कोर – लेफ्टिनेंट जनरल मोहन थापन

और संचार क्षेत्र से समर्थन: 101 कम्युनिकेशन ज़ोन – मेजर जनरल गुरबख्श सिंह

इन सभी के समन्वय की ज़िम्मेदारी थी — ईस्टर्न कमांड के जीओसी-इन-सी – लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा की।

"अपने बच्चों के पास लौट जाओ" – दुश्मन से करुणा भरा संवाद

9 दिसंबर को मानेकशॉ ने पाकिस्तानी सैनिकों को रेडियो संदेश भेजा:

"भारतीय सेना ने आपको घेर लिया है।आपकी वायुसेना नष्ट हो चुकी है।कोई मदद नहीं आएगी।हथियार डाल दो — यह शर्म की बात नहीं।हम तुम्हें एक सैनिक की तरह सम्मान देंगे।क्या तुम नहीं चाहते कि अपने बच्चों के पास लौटो?"

इस संदेश ने दुश्मन के मन में मानवीय संवेदना और पराजय का बोध जगा दिया।

आत्मसमर्पण — बिना प्रतिशोध, बिना क्रूरता

16 दिसंबर 1971 —93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया।यह इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था।

इंदिरा गांधी चाहती थीं कि सैम ढाका जाकर आत्मसमर्पण स्वीकार करें,पर उन्होंने यह सम्मान जनरल अरोड़ा को सौंपते हुए कहा —

"श्रेय उसे मिलना चाहिए जिसने युद्ध लड़ा है।"

लूट और अत्याचार पर सख़्त आदेश

उन्होंने युद्ध के बाद सेना को आदेश दिया:

"जब किसी बेगम को देखो, जेब में हाथ रखो और सैम को याद करो।"(अर्थात: संयम रखो, मर्यादा रखो।)

परिणामस्वरूप, लूटपाट और बलात्कार की घटनाएँ शून्य के बराबर रहीं।

"दुश्मन नहीं, मानव हैं" – युद्धबंदियों के साथ सम्मान

पाकिस्तानी कैदियों को क़ुरआन पढ़ने, त्योहार मनाने,और घर से चिट्ठियाँ और उपहार पाने की अनुमति दी गई।उनसे इंसानियत के साथ पेश आया गया

कुछ मंत्रियों ने आलोचना की कि वे कैदियों को "दामाद" जैसा रख रहे हैं,पर सैम मानेकशॉ का उत्तर था —

"मैं एक सैनिक हूँ। मैं दुश्मन से भी गरिमा के साथ पेश आता हूँ।"

एक राष्ट्र बना – बांग्लादेश

12 दिनों में युद्ध समाप्त हुआ —2,000 भारतीय शहीद,6,000 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए,93,000 युद्धबंदी,और जन्म हुआ —एक नए, स्वतंत्र देश 'बांग्लादेश' का।

"जो मर्यादा निभाए, वही सच्चा विजेता"

जनवरी 1973 में राष्ट्रपति वी.वी. गिरी ने उन्हेंभारत के पहले फील्ड मार्शल की उपाधि से नवाज़ा।

सैम मानेकशॉ का यह अभियान सिर्फ एक सैन्य विजय नहीं था,बल्कि यह था— मानवता, मर्यादा और नीति का विजयपर्व।

एक योद्धा का सर्वोच्च सम्मान – फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

1971 की ऐतिहासिक विजय के बाद, जब सम्पूर्ण भारत गर्व और कृतज्ञता से भर उठा था —प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तय किया किइस महान विजयी सेनानायक को देश का पहला 'चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS)' नियुक्त किया जाए।परंतु यह सपना साकार न हो सका...

वायुसेना और नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों को यह भय था कियदि सेना का कोई अधिकारी सर्वोच्च रक्षा प्रमुख बनता है,तो उनकी छोटी सेनाओं की उपेक्षा हो सकती है।इधर नौकरशाही भी सशंकित थी —कहीं सैम जैसे निर्भीक और स्वतंत्र सेनापति के कारणउनकी सत्ता और प्रभाव कम न हो जाए।

इस प्रकार, वह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।लेकिन... राष्ट्र की आत्मा ने उस नायक को नहीं भुलाया।

🏵️ राष्ट्र का नमन – फील्ड मार्शल की उपाधि

हालांकि मानेकशॉ जून 1972 में सेवानिवृत्त होने वाले थे,किन्तु राष्ट्र ने उन्हें और 6 महीने सेवा में बनाए रखा

और फिर आया वह गौरवपूर्ण दिन —1 जनवरी 1973 कोभारत सरकार ने उन्हें,

"सशस्त्र सेनाओं और राष्ट्र के प्रति उनकी अनुपम सेवा के लिए",‘फील्ड मार्शल’ की उपाधि प्रदान की —एक ऐसा सम्मान, जो किसी भी भारतीय सैन्य अधिकारी को पहली बार मिला था।

राष्ट्रपति भवन में इतिहास बना

3 जनवरी 1973,राष्ट्रपति भवन के भव्य प्रांगण में वह ऐतिहासिक समारोह आयोजित हुआ —जहां भारत के सपूत सैम मानेकशॉ कोराष्ट्रपति वी.वी. गिरी नेफील्ड मार्शल की विशिष्ट रैंक के प्रतीक चिह्न प्रदान किए

एक जीवन, जो पद से नहीं, सेवा से महान बना

यह सम्मान केवल उनके कंधों पर सितारे टांकने का नहीं था —बल्कि यह था उस आस्था का आलंबन,कि जब नेतृत्व में निष्ठा, दूरदृष्टि और साहस हो,तो कोई पद बहुत बड़ा नहीं, औरकोई विजयी सिपाही छोटा नहीं

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ,अब केवल एक सेनापति नहीं,बल्कि बन चुके थे —राष्ट्र की गौरवगाथा का अमर अध्याय

सम्मानों से अलंकृत, इतिहास में अमर – फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

1971 की युद्ध-विजय के बाद जब भारत विजयी नायक को नमन कर रहा था,राष्ट्रपति वी.वी. गिरी ने सैम मानेकशॉ कोभारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान —पद्म विभूषण से 1972 में विभूषित किया।

यह सम्मान केवल एक मेडल नहीं था —यह राष्ट्र की उस कृतज्ञता की मुहर थी,जो अपने प्रहरी को उसकी चार दशकों की समर्पित सेवा के लिए अर्पित की गई थी।

सेना दिवस पर सेनापति की विदाई

15 जनवरी 1973 — सेना दिवस,भारत का वह दिन जब उसकी सेना को सलाम किया जाता है —उसी दिन सैम मानेकशॉ ने सेना की वर्दी को अंतिम बार सलाम किया

लेकिन यह विदाई केवल एक पोस्टिंग की समाप्ति नहीं थी —यह था एक युग का समापन

शांति की गोद में — कुनूर का सरल जीवन

सेवा निवृत्ति के बाद वे अपने परिवार संग बस गए कुनूर में —वही शांतिपूर्ण पहाड़ी नगर, जो कभी उनका प्रशिक्षण स्थल रहा था।

जहां एक ओर वह रणभूमि के नायक थे,वहीं दूसरी ओर वह अब थे —कुनूर की गलियों में टहलता एक सरल, आत्मचिंतनशील वृद्ध,जिसकी मुस्कान में आज भी पूरा राष्ट्र बसता था।

नेपाल का सम्मान, कंपनियों की कमान

सिर्फ़ भारत ही नहीं,नेपाल ने भी उन्हें अपना ‘आनरेरी जनरल’ घोषित किया,और 1977 में राजा बीरेन्द्र ने उन्हें"त्रि-शक्ति-पट्टा प्रथम श्रेणी" सम्मान से अलंकृत किया।

उन्होंने सेवा निवृत्ति के बादबॉम्बे बर्मा ट्रेडिंग कंपनी, ब्रिटानिया और एस्कॉर्ट्स लिमिटेड जैसीअग्रणी कंपनियों के बोर्ड में कार्य किया —जैसे युद्ध के बाद वो राष्ट्रनिर्माण की शांति यात्रा पर निकल पड़े हों।

30 वर्षों बाद मिला न्याय

यद्यपि 1973 में उन्हें फील्ड मार्शल की रैंक दी गई थी,पर उन्हें तीन दशक तक उस रैंक की पूरी पेंशन नहीं मिली

यह तकलीफ तब समाप्त हुई,जब 2007 में भारत के राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम स्वयंउनसे वेलिंगटन में मिलने आए औरउन्हें ₹1.3 करोड़ रुपये का चेक सौंपा —30 वर्षों के बकाया वेतन का न्यायपूर्ण मूल्य

सच्चाई के सिपाही, व्यंग्य के योद्धा

मानेकशॉ राजनीति और नौकरशाही की कठोर आलोचना करते थे।एक बार व्यंग्य करते हुए बोले —

"क्या हमारे राजनेताओं को पता है कि मोर्टार और मोटर में क्या फर्क है?गन और हाउविट्ज़र क्या होता है?गुरिल्ला और गोरिल्ला में फर्क जानते हैं?(हालाँकि कई तो गोरिल्ला जैसे ही लगे हैं...)"

उनकी वाणी में कटाक्ष था, पर देशभक्ति की ज्वाला भी

कारगिल के नायकों का संरक्षक

जब कारगिल युद्ध में भारत के वीर सैनिक घायल हुए,तब यह वृद्ध सेनापति अस्पतालों में गया,और उनके बगल बैठकर उन्हें ढांढस बंधाया।

सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक ने उन्हेंअपना "आइकन" कहा।

*******एक ऐसा सेनापति, जो केवल रणभूमि नहीं —

राष्ट्र के दिलों में भी विजयी रहा।*******

निजी जीवन — प्रेम, परिवार और परछाइयाँ

22 अप्रैल 1939 — बंबई का वह दिन जबसैम मानेकशॉ ने अपने जीवन की सबसे ख़ूबसूरत साझेदारसिलो बोडे का हाथ थामा।एक वीर सेनापति और एक नर्मदिल पति की प्रेमगाथा शुरू हुई।

इस पवित्र बंधन से दो बेटियाँ जन्मीं —शैरी (1940) और माया (1945)।उनकी हँसी से वह वीर योद्धा का घर भी खिलखिलाता था —जो रणभूमि में गरजता था,वह घर पर बेटियों की गुड़ियों से खेलता था।

अलविदा सेनापति: अंतिम यात्रा की शांति

27 जून 2008, रात 12:30 बजे —वेलिंगटन के मिलिट्री हॉस्पिटल में जब94 वर्षीय मानेकशॉ ने निमोनिया से जूझते हुए अंतिम साँस ली,उनके होंठों पर आखिरी शब्द थे —

"I’m okay!"

जैसे कोई सच्चा योद्धा आखिरी लड़ाई को भी मुस्कुरा कर जीत रहा हो।

मौन सम्मान, मगर तीव्र वेदना

उन्हें पूर्ण सैन्य सम्मान के साथउधगमंडलम (ऊटी) के पारसी कब्रिस्तान मेंअपनी जीवन संगिनी सिलो के बगल मेंअंतिम विश्राम मिला।

परंतु उस अंतिम सलामी में कोई सरकारी प्रतिनिधि नहीं था।ना कोई राष्ट्रव्यापी शोक,ना झुके झंडे,ना बजा शोक-संगीत...

जैसे भारत ने अपने सबसे वीर सपूत को मौन में विदा किया।

मीडिया ने इसे नागरिक सत्ता का सैन्य वीरता से भय बताया —कि कहीं यह “नायक” जनमानस में इतना न बस जाए,कि लोकतंत्र में साहस शासन करने लगे।

बांग्लादेश ने झुकाया सिर...

जहाँ भारत मौन रहा,बांग्लादेश ने अपनी श्रद्धांजलि दी —उस सेनानायक को, जिसने उनके स्वतंत्र अस्तित्व की नींव रखी।

वारिसों की स्मृतियों में अमर

उनकी दो बेटियाँ और तीन पोते-पोतियाँ आज भीउस महान आत्मा की गाथा को जीवित रखे हुए हैं।उनकी मुस्कान में आज भी “सैम बहादुर” की छवि झलकती है।

🌟 जो जीवन भर मातृभूमि का प्रहरी रहा,

उसकी अंतिम विदाई भी वीरों जैसी थी —शांत, संकल्पित और सजीव।*****

चरित्र — जो व्यक्तित्व स्वयं में एक संस्था था

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ केवल एक सैन्य अधिकारी नहीं थे,वे चलती-फिरती प्रेरणा, एक जीवंत किंवदंती थे —जिनकी वाणी में करिश्मा था, व्यक्तित्व में आकर्षण,और चाल में एक ऐसी गरिमा, जो समय से परे थी।

उन्हें देखकर अक्सर लोग कहते —

"वो सिर्फ सेना के जनरल नहीं,एक सच्चे जेंटलमैन थे।"

वह ब्रिटिश अनुशासन के तेज में हिंदुस्तानी आत्मा का ताप थे

ब्रिटिश आर्मी की पृष्ठभूमि ने उन्हेंकुछ खास अंग्रेज़ आदतें दी थीं —हैंडलबार मूंछें, हाथ में व्हिस्की का गिलास,पर दिल — हमेशा भारतीय।

उनकी पारसी विरासत भीउनके भीतर के अनुशासन, सौम्यता और सफलता की एक अनकही कुंजी थी।परिवार, परंपरा और परिश्रम — सबका मिला-जुला रंग उनके चरित्र में था।

सैनिकों के दिलों के सेनापति

उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी —सैनिकों का निःस्वार्थ प्रेम और सम्मान

गोरखा रेजिमेंट उन्हें "सैम बहादुर" कहकरसिर्फ इसलिए नहीं पूजती थी कि वे कमांडर थे,बल्कि इसलिए कि

"वे दंड नहीं, न्याय देते थे,और हर सिपाही को अपने बेटे जैसा मानते थे।"

उनकी नज़रों में सैनिक की जाति नहीं,उसकी निष्ठा और वीरता मायने रखती थी।

राजनीति के सामने सत्य का प्रहरी

वे केवल सेनापति नहीं,सत्ता से प्रश्न करने वाला विवेक भी थे।

उन्होंने कई बार राजनीतिज्ञों की अविवेकपूर्ण या अनैतिक मांगों को ठुकराया।इसलिए कुछ नेताओं को उनका सीधा और लोकप्रिय व्यक्तित्व अखरता था।

उनकी व्यंग्यात्मक शैली ने अक्सर नेताओं को चुप कर दिया,पर इंदिरा गांधी जैसे दूरदर्शी नेताउनकी सच्चाई को पहचानते थे।

रणनीति में स्पष्टता, विचार में स्वतंत्रता

वे उन विरले सेनाधिकारियों में से थेजो नीतिगत मामलों में भी साहसपूर्वक अपने विचार रखते थे,और जब-जब राजनीति में सैन्य रणनीति के साथ समझौता हुआ,उन्होंने दृढ़ता से राष्ट्रहित में सुझाव दिया।

एडमिरल अरुण प्रकाश के अनुसार,

“आज के समय में ऐसे अफसर बिरले ही मिलते हैं।”

*****सैम मानेकशॉ का चरित्र

एक ऐसा दर्पण था जिसमें भारत ने अपनी वीरता, गरिमा और विवेक को देखा।*****

सम्मान और अलंकरण

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को मिले वीरता और सेवा के ये चिह्न,सिर्फ पदक नहीं थे, बल्कि राष्ट्र की श्रद्धांजलि थे —उस योद्धा के प्रति जिसने अपना पूरा जीवन भारत माँ को समर्पित कर दिया।

🇮🇳 राष्ट्र द्वारा प्रदान किए गए उच्चतम नागरिक सम्मान:

  • पद्म विभूषण (1972) – राष्ट्र की ओर से एक सेनापति को सर्वोच्च नमन।

  • पद्म भूषण – उनकी दीर्घकालिक सेवा और अपूर्व सैन्य नेतृत्व के लिए।

सेना सेवा व युद्ध पदक:

  • जनरल सर्विस मेडल – सीमाओं पर सतत सजग प्रहरी के रूप में।

  • पूर्वी तारा (Poorvi Star) – बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में निर्णायक विजय का प्रतीक।

  • पश्चिमी तारा (Paschimi Star) – पश्चिमी मोर्चे पर वीरता का सम्मान।

  • रक्षा मेडल (Raksha Medal) – मातृभूमि की रक्षा में समर्पण के लिए।

  • संग्राम मेडल – 1971 के युद्ध में अभूतपूर्व भूमिका के लिए।

  • सैन्य सेवा मेडल (Sainya Seva Medal) – अनुशासित दीर्घकालिक सेवा के प्रतीक।

स्वतंत्रता एवं दीर्घ सेवा स्मृति पदक:

  • भारतीय स्वतंत्रता पदक (Indian Independence Medal) – आज़ादी के बाद भी भारत के निर्माण में भागीदारी।

  • स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ पदक – स्वतंत्र भारत के रक्षक के रूप में मान्यता।

  • 20 वर्ष दीर्घ सेवा पदक – दो दशक से अधिक निस्वार्थ सैन्य सेवा।

  • 9 वर्ष सेवा पदक – सैन्य अनुशासन व समर्पण के शुरुआती वर्षों की पहचान।

अंतरराष्ट्रीय वीरता सम्मान:

  • मिलिट्री क्रॉस (Military Cross) – द्वितीय विश्वयुद्ध में अद्वितीय वीरता के लिए ब्रिटेन द्वारा प्रदत्त।

युद्धकालीन अभियान पदक:

  • 1939–45 स्टार – द्वितीय विश्वयुद्ध में सक्रिय भागीदारी।

  • बर्मा स्टार (Burma Star) – बर्मा मोर्चे पर शौर्य का प्रतीक।

  • वॉर मेडल 1939–1945 – विश्व युद्ध की तपन में तपे सैनिक की पहचान।

  • इंडिया सर्विस मेडल – युद्ध के कठिनतम समय में भारत की सेवा।

अन्य विशिष्ट सम्मान:

  • डिस्टिंग्विश्ड कंडक्ट मेडल (Distinguished Conduct Medal) – असाधारण नेतृत्व और नैतिक आचरण के लिए।

इन अलंकरणों से सुशोभित वर्दी केवल शोभा नहीं थी, बल्कि उस साहसी हृदय की गाथा थी जो हर क्षण भारत के लिए धड़कता था।

स्मृति और विरासत: अमर ‘सैम बहादुर’

विजय दिवस, हर वर्ष 16 दिसंबर को, पूरे देश में गर्व और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है—यह वो ऐतिहासिक दिन है जब भारत माता के वीर पुत्र, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के नेतृत्व में, 1971 के युद्ध में ऐतिहासिक विजय प्राप्त की गई थी। यह केवल युद्ध की जीत नहीं थी, यह धैर्य, रणनीति, मानवीयता और पराक्रम की विजय थी।

दिल्ली छावनी स्थित "मानेकशॉ सेंटर", जो उनकी स्मृति में समर्पित है, आज भी भारतीय सेना के सर्वोच्च विचार-विमर्श और द्विवार्षिक सेना कमांडरों के सम्मेलन का स्थल बनता है। इस प्रतिष्ठित भवन का उद्घाटन 21 अक्टूबर 2010 को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा किया गया था।

COAS जनरल बिक्रम सिंह ने मानेकशॉ की प्रतिमा का अनावरण कर राष्ट्र को स्मरण दिलाया कि यह मूर्ति केवल एक व्यक्ति की नहीं, एक युग की चेतना है। पुणे छावनी में स्थित उनकी प्रतिमा हो या बेंगलुरु का मानेकशॉ परेड ग्राउंड, हर ईंट, हर शिला आज भी गूंजती है—"सम बहादुर अमर रहें!"

2008 में, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा जारी डाक टिकट पर मानेकशॉ की वर्दी में उनकी भव्य छवि दिखाई गई—वह मुद्रा, वह तेज, जो हर युवा को प्रेरणा देता है। उसी वर्ष, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद के शिवरंजेनी क्षेत्र में एक फ्लाईओवर को उनके नाम पर समर्पित कर दिया।

नीलगिरी की पहाड़ियों में वेलिंगटन के पास मानेकशॉ ब्रिज पर बनी ग्रेनाइट की प्रतिमा, उनकी मौन उपस्थिति की तरह आज भी राहगीरों को सैन्य गौरव का बोध कराती है। पुणे की मानेकजी मेहता रोड पर स्थापित उनकी प्रतिमा भी, उनके योगदान की अमिट छाया बन चुकी है।

सेना की थिंक टैंक संस्था, Centre for Land Warfare Studies, आज अपने शोध पत्रों को “मानेकशॉ पेपर्स” के नाम से प्रकाशित करती है—यह केवल शोध नहीं, बल्कि सेना के महानायक को बौद्धिक श्रद्धांजलि है।

2023 में आई बायोपिक "सैम बहादुर" में अभिनेता विक्की कौशल ने उनके किरदार को जीवंत किया, जिसे देखकर आज की पीढ़ी को उनके भीतर का योद्धा, रणनीतिकार और सच्चा देशभक्त महसूस हुआ।

साहित्य में भी, सलमान रुश्दी ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास "मिडनाइट्स चिल्ड्रन" में मानेकशॉ और उनके पाकिस्तानी समकालीन ‘टाइगर नियाज़ी’ के बीच संवाद को अमर कर दिया—“सैम एंड द टाइगर” शीर्षक से। यह केवल कल्पना नहीं, इतिहास के दो ध्रुवों के बीच युद्ध और मानवीयता की गूंजती प्रतिध्वनि है।

सैम मानेकशॉ आज भी जीवित हैं—हर जवान की आंखों में, हर परेड की ताल में, हर विजय दिवस की सलामी में।उनकी विरासत किसी पदक की मोहताज नहीं, वह भारत की आत्मा में रची-बसी प्रेरणा है। 🇮🇳

सैनिकों का मान-सम्मान: सैलरी नहीं, सेवा का मूल्य

साल था 1970 — जब भारत की सशस्त्र सेनाओं को पहली बार यह अवसर मिला कि उनके परिश्रम, त्याग और जीवन-जोखिम वाली सेवाओं को उस मंच पर सुना जाए जहाँ बाकी सरकारी कर्मचारियों का वेतन तय होता था — वेतन आयोग। इससे पहले की दो वेतन आयोगों में सेना को स्थान नहीं मिला था, लेकिन तीसरे वेतन आयोग में सेना की भागीदारी की उम्मीद जगी।

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, जो अपने जवानों के केवल सेनापति ही नहीं, संवेदनशील संरक्षक भी थे, उन्होंने सरकार को यह समझाया कि एक सैनिक का मूल्य वेतन की गणना से नहीं, उसकी सेवा की कठिन परिस्थितियों से आंका जाना चाहिए। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सैनिकों के वेतनमान उनकी जोखिमभरी जिम्मेदारियों के अनुसार तय हों — जिसे आज हम "Hazard Pay" या "जोखिम भत्ता" के नाम से जानते हैं।

उनकी इस ऐतिहासिक पहल का ही परिणाम है कि आज भी हमारे सैनिकों के वेतनमान सेवा की वास्तविकता और बलिदान की भावना को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किए जाते हैं।

सैनिकों का परिश्रम और बलिदान अमूल्य है, लेकिन मानेकशॉ ने यह सुनिश्चित किया कि उनके त्याग को सम्मान रूपी वेतन में एक पहचान मिले।

यह वेतन नहीं था — यह राष्ट्र की श्रद्धांजलि थी। 🇮🇳

रणनीति के सम्राट: सैम मानेकशॉ की युद्ध नीति जो युगों तक गूंजेगी

1971 के युद्ध में फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ द्वारा रची गई रणनीति न केवल भारत की ऐतिहासिक विजय का आधार बनी, बल्कि भविष्य की "कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन" जैसी तेज़ और समन्वित सैन्य योजनाओं की प्रेरणा भी बनी। उनके सह सेनानायक लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह के साथ मिलकर मानेकशॉ ने एक ऐसा युद्ध चक्र तैयार किया, जिसे सैन्य विश्लेषकों ने "ब्लिट्जक्रिग" से भी तीव्र और चौंकाने वाला करार दिया।

विशेषकर भौगोलिक रूप से कठिन पूर्वी क्षेत्र में IV कॉर्प्स की बिजली गति से की गई तैनाती ने दुश्मन को न केवल पस्त किया, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से हिला दिया। यह केवल एक रणनीति नहीं थी—यह सैन्य कौशल, राष्ट्रप्रेम और दूरदृष्टि का संगम था।

फ्रांसीसी युद्ध विशेषज्ञ जनरल आंद्रे ब्यूफ्रे, जिन्होंने पहले पाकिस्तान की ओर से युद्धों का अवलोकन किया था, मानेकशॉ के आमंत्रण पर भारत आए और स्वीकार किया कि भारत का पूर्वी मोर्चे पर युद्ध संचालन अद्भुत गति और चतुराई से भरा था। यद्यपि उन्होंने शकरगढ़ के आसपास की धीमी प्रगति पर टिप्पणी की, फिर भी उन्होंने इस युद्ध को एक आदर्श "मेनूवर वारफेयर" करार दिया।

स्वयं मानेकशॉ ने जब उनकी रणनीति की तुलना जर्मन कमांडर रोमेल से की गई, तो उन्होंने विनम्रता से कहा —

"ऐसा कहना हास्यास्पद होगा..."यह विनम्रता, उस योद्धा की पहचान थी जो विजय को भी शांति से पहनता था।

साल 1966 में, दिल्ली से कोलकाता की एक उड़ान में, मानेकशॉ अमेरिका के वाणिज्यदूत विलियम हिचकॉक के साथ सहयात्री थे। उस उड़ान में उन्होंने कश्मीर में सेना की कम उपस्थिति, 1965 के युद्ध में 3 लाख पूर्वी सैनिकों को न झोंकने की गलती, और रूस पर बढ़ती निर्भरता पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके पास अधिक अधिकार होते, तो वह भारत को वियतनाम युद्ध में अमेरिका के प्रति सहानुभूति दिखाने की सलाह देते

यह थे सैम मानेकशॉ—एक सेनानायक जो बंदूक से अधिक रणनीति से लड़ते थे, और जिनकी सोच सीमाओं से परे जाकर भारत को एक विजयी भविष्य की दिशा में ले गई।

🇮🇳 रणनीति के शिल्पकार, राष्ट्र की ढाल।

आत्मनिर्भर सैन्य शक्ति के समर्थक: मानेकशॉ की दूरदृष्टि

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ केवल रणभूमि के विजेता नहीं थे, बल्कि वे भारत की रक्षा नीति के दूरदर्शी शिल्पकार भी थे। वे हमेशा इस बात के प्रबल पक्षधर रहे कि भारत को अपनी रक्षा उत्पादन प्रणाली को स्वदेशी बनाना चाहिए—एक ऐसी व्यवस्था जो बाहरी आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता को खत्म कर सके और समय पर सेना को हथियार, उपकरण व संसाधन उपलब्ध करवा सके।

उन्होंने बार-बार चेताया कि सोवियत संघ और बाद में रूस पर अत्यधिक निर्भरता, भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता के लिए खतरे की घंटी है। मानेकशॉ का मानना था कि जब तक भारत अपने आधुनिक रक्षा उपकरणों का निर्माण स्वयं नहीं करता, तब तक उसकी संप्रभुता अधूरी है।

1971 के युद्ध के दौरान, जब देश का भाग्य दांव पर था, तब मानेकशॉ ने अकल्पनीय तेज़ी से उपकरणों और संसाधनों की व्यवस्था कर ली—न केवल उन्होंने युद्ध के लिए नई डिविजनों का गठन किया, बल्कि सामरिक रूप से भारत को संख्यात्मक और गुणवत्ता की श्रेष्ठता भी दिलाई।

हालांकि वे स्थायी और संरचनात्मक सुधार लाने में सीमित रहे, फिर भी उनके विचार आज भी आत्मनिर्भर भारत की सैन्य नीति की प्रेरणा हैं।

"हथियार केवल वस्त्र नहीं, आत्मनिर्भरता की ढाल हैं। जब अपने देश में बने तो न शंका रहेगी, न रुकावट।"— फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की मौन प्रेरणा 🇮🇳

विशेष अभियान: साहस, रणनीति और मानेकशॉ की स्वीकृति का परिणाम

जब वीरता को योजनाबद्ध बुद्धिमत्ता का साथ मिलता है, तब इतिहास रचता है। ऐसा ही हुआ जब ब्रिगेडियर भवानी सिंह ने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को एक अद्वितीय विशेष अभियान – 'चाचरो रेड' – की आवश्यकता और उसकी रणनीति से अवगत कराया।

सिंध प्रांत के उमरकोट तक गहराई में जाकर, भारतीय विशेष बलों ने पाकिस्तान के 13,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। यह न केवल भारत की सैन्य क्षमता का प्रतीक था, बल्कि साहस, सूझबूझ और गुप्त योजना का अद्भुत संगम भी था। यह ऑपरेशन आज भी भारतीय सेना के सर्वाधिक सफल विशेष अभियानों में से एक माना जाता है।

और इसकी सफलता के मूल में था मानेकशॉ का निर्णय लेने का साहस, उनका भरोसा अपने अफसरों पर, और भारत की सुरक्षा के लिए उठाया गया एक निर्णायक कदम।

"विशेष अभियान केवल गुप्त युद्ध नहीं, राष्ट्र की सीमाओं पर लिखी गई साहस की गाथा होते हैं – और सैम मानेकशॉ उस गाथा के अदृश्य सेनापति थे।"

विद्रोह पर निर्णायक प्रहार: मिज़ोरम में मानेकशॉ की दूरदर्शी नीति

सन 1966 — मिज़ोरम की पहाड़ियों में उग्रवाद भड़क रहा था। शांति को तोड़ने की हर साज़िश को कुचलने की ज़िम्मेदारी उस सेनापति पर थी, जो केवल एक सैन्य अधिकारी नहीं, बल्कि रणनीति, मानवता और नैतिकता का जीता-जागता प्रतीक था — सैम मानेकशॉ

उन्होंने विद्रोह का सामना पारंपरिक युद्ध से नहीं, बल्कि दूरदर्शी योजना और मानवीय विवेक से किया। उन्होंने “स्पेशलाइज़ेशन” नामक रणनीति अपनाई — छोटे और बिखरे गांवों को एकीकृत कर, ऐसे बसे हुए क्षेत्र बनाए गए जहाँ न तो आतंकवादी छिप सकें, न ही उन्हें स्थानीय समर्थन मिल सके। यह नीति केवल सैन्य चाल नहीं थी, यह जनता की रक्षा और सैनिकों की जान बचाने की चतुर रणनीति थी।

इससे सेना को छोटे क्षेत्र में निगरानी करनी पड़ी, जिससे जान-माल की हानि कम हुई, और विद्रोहियों को भोजन, आश्रय और मानव कवच से वंचित कर दिया गया।

"जहां युद्ध केवल गोली से नहीं, बुद्धि और संवेदना से लड़ा जाता है — वहीं मानेकशॉ जैसे सेनापति इतिहास बनाते हैं।"


"Jai Hind - Jai Sam Bahadur"


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